उत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीनों को कौड़ियों के भाव निजी हाथों में सौंपना प्रदेश के हितों के साथ बड़ा खिलवाड़: राकेश राणा

टिहरी

उत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीनों को कौड़ियों के भाव निजी हाथों में सौंपना प्रदेश के हितों के साथ बड़ा खिलवाड़: राकेश राणा

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव राकेश राणा ने धामी सरकार पर उत्तराखंड की सरकारी जमीनों और बेशकीमती संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने की नीति अपनाने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश की जमीन किसी सरकार या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जनता की धरोहर है। इसकी बंदरबांट करने का अधिकार किसी को नहीं है।
राणा ने कहा कि विभिन्न विभागों की लगभग 1,080 एकड़ भूमि को उत्तराखंड इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (UIIDB) के अधीन लाने और उसके हस्तांतरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि जमीन किसे दी जाएगी और किन शर्तों पर दी जाएगी, इसका निर्णय भी सरकार के शीर्ष स्तर पर ही केंद्रित रहेगा, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा कि पटवा डांगर की लगभग 14 एकड़ जमीन, अलकनंदा होटल और जॉर्ज एवरेस्ट जैसी महत्वपूर्ण संपत्तियों को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार को सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए। विशेष रूप से जॉर्ज एवरेस्ट जैसी ऐतिहासिक और विरासत से जुड़ी संपत्ति को निजी हाथों में देने की शर्तें, मूल्यांकन प्रक्रिया और उससे प्रदेश को होने वाले लाभ का पूरा ब्यौरा जनता के सामने रखा जाना चाहिए।
राकेश राणा ने कहा कि सरकार का काम प्रदेश की जमीनों को औने-पौने दामों पर निजी कंपनियों या चुनिंदा लोगों को सौंपना नहीं, बल्कि इन संसाधनों का उपयोग उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार देने, स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने, पर्यटन को मजबूत करने और पलायन रोकने के लिए करना है। सरकार यदि वास्तव में निवेश लाना चाहती है तो स्थानीय युवाओं, बेरोजगारों, छोटे उद्यमियों और उत्तराखंड के मूल निवासियों को प्राथमिकता क्यों नहीं देती?
उन्होंने कहा कि नवंबर 2022 में आयोजित चिंतन शिविर के बाद UIIDB के माध्यम से सरकारी भूमि के प्रबंधन और निवेश संबंधी निर्णयों की जो व्यवस्था विकसित की गई, उसमें पारदर्शिता और जनभागीदारी सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। किसी भी बोर्ड या सरकारी व्यवस्था को जनता की संपत्ति के हस्तांतरण का ऐसा माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता, जहां निर्णय प्रक्रिया पर जनता और जनप्रतिनिधियों की निगरानी कमजोर पड़ जाए।

राकेश राणा ने सरकार से पांच प्रमुख सवाल पूछे—
प्रदेश के विभिन्न विभागों की 1,080 एकड़ जमीन UIIDB को हस्तांतरित करने का आधार और उद्देश्य क्या है?
इन जमीनों का स्वतंत्र एजेंसी से बाजार मूल्यांकन कराया गया है या नहीं?
पटवा डांगर, अलकनंदा होटल और जॉर्ज एवरेस्ट जैसी संपत्तियों को किन शर्तों पर निजी हाथों में दिया जा रहा है?
इन जमीनों से मिलने वाले आर्थिक लाभ में उत्तराखंड के स्थानीय युवाओं और मूल निवासियों की हिस्सेदारी क्या होगी?
भूमि आवंटन की पूरी प्रक्रिया, टेंडर की शर्तें और लाभार्थियों की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है?
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य का गठन जल, जंगल, जमीन और स्थानीय संसाधनों पर जनता के अधिकारों की रक्षा के संकल्प के साथ हुआ था। राज्य आंदोलनकारियों ने जिस उत्तराखंड का सपना देखा था, वह कुछ चुनिंदा लोगों के व्यावसायिक हितों के लिए नहीं, बल्कि आम जनता के बेहतर भविष्य के लिए था। आज प्रदेश का युवा रोजगार के लिए पलायन कर रहा है, किसान अपनी जमीन और आजीविका बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है और सरकार सरकारी संपत्तियों के निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है।

राणा ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी प्रदेश की एक-एक इंच जमीन और सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण के लिए जनता के बीच जाकर सड़क तक संघर्ष करेगी। सरकार को चाहिए कि विवादित भूमि आवंटन की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाए, सभी संपत्तियों का स्वतंत्र एवं पारदर्शी मूल्यांकन कराए तथा भूमि हस्तांतरण से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक करे। यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता या भ्रष्टाचार हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड बिकाऊ नहीं है, उत्तराखंड की जमीन किसी की निजी जागीर नहीं है। यह हमारे पूर्वजों की विरासत और आने वाली पीढ़ियों का अधिकार है। भाजपा सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि प्रदेश के जल, जंगल और जमीन की लूट के खिलाफ कांग्रेस चुप बैठने वाली नहीं है। उत्तराखंड की संपत्तियों की रक्षा हमारा राजनीतिक ही नहीं, बल्कि नैतिक और ऐतिहासिक दायित्व भी है।
जमीन उत्तराखंड की, अधिकार उत्तराखंड की जनता का और फैसला भी जनता के हित में ही होगा