पहाड़ में बढ़ता मानव–वन्यजीव संघर्ष गंभीर, सरकार तुरंत ठोस कदम उठाए: मोहित डिमरी

उत्तराखंड

पहाड़ में बढ़ता मानव–वन्यजीव संघर्ष गंभीर, सरकार तुरंत ठोस कदम उठाए: मोहित डिमरी

उत्तराखंड में लगातार बढ़ते मानव–वन्यजीव संघर्ष को लेकर उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के महासचिव एवं मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के संस्थापक संयोजक मोहित डिमरी ने सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि पहाड़ के लोग आज भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं, लेकिन सरकार और नीति-निर्माताओं की ओर से कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है।

मोहित डिमरी ने कहा कि सोशल मीडिया पर जब भी जंगली जानवरों के हमलों में घायल और लहूलुहान लोगों की तस्वीरें सामने आती हैं, तो यह पूरे समाज को झकझोर देती हैं। “पहाड़ के लोग हर दिन, हर पल मौत के साये में जी रहे हैं, लेकिन इस दर्द की कोई झलक सत्ता के गलियारों में नजर नहीं आती,” उन्होंने कहा।

उन्होंने बताया कि आज हालात ऐसे हैं कि महिलाएं और पुरुष जब घास–लकड़ी लेने जंगल जाते हैं, तो घर में बैठे परिजन हर पल इसी चिंता में रहते हैं कि वे सही-सलामत लौटेंगे भी या नहीं। बच्चे अकेले स्कूल जाने से डर रहे हैं, बंदर घरों में घुसकर हमला कर रहे हैं और जंगली सूअर किसानों की साल भर की मेहनत को एक ही रात में तबाह कर रहे हैं। वहीं गुलदार और भालू के हमले लगातार मानव जीवन के लिए खतरा बने हुए हैं।

डिमरी ने कहा कि लंबे संघर्ष के बाद राज्य बना था, इस उम्मीद के साथ कि पहाड़ के संकट दूर होंगे, लेकिन सच्चाई यह है कि हालात पहले से ज्यादा बिगड़ चुके हैं। “हमारे लोग मारे जा रहे हैं और सत्ता में बैठे लोग चैन की नींद सो रहे हैं। देहरादून में बड़े-बड़े घर और आरामदायक ज़िंदगी है, लेकिन पहाड़ उनके एजेंडे से गायब है। इसकी कीमत हर बार हमारे गांवों के लोग चुकाते हैं,” उन्होंने कहा।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पहाड़ में रहने वाले इंसान की कोई कीमत नहीं है। “क्या किसी नेता या बड़े अधिकारी के बेटे को कभी गुलदार या भालू ने मारा है? नहीं। यहां हमेशा आम जनता ही कीमत चुकाती है, और यही पलायन का सबसे बड़ा कारण बन रहा है,” डिमरी ने कहा।

मोहित डिमरी ने यह आशंका भी जताई कि कहीं योजनाबद्ध तरीके से बाहर से जंगली जानवरों को पहाड़ों में तो नहीं छोड़ा जा रहा। उन्होंने कहा कि जिस तरह बंदरों की संख्या अचानक बढ़ी है और गुलदार आबादी वाले क्षेत्रों में बेखौफ घूम रहे हैं, उससे यह समस्या सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव-निर्मित भी प्रतीत होती है। यदि ऐसा है, तो यह पहाड़ के लोगों के साथ सीधा अपराध है।

सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि राज्य बनने के बाद सरकारें तो बदलीं, लेकिन जमीनी हालात नहीं बदले। आज भी मानव–वन्यजीव संघर्ष को लेकर कोई स्थायी नीति नहीं है। वन विभाग के पास न पर्याप्त स्टाफ है, न आधुनिक संसाधन और न ही गांव स्तर पर मजबूत तंत्र।

डिमरी ने सरकार को कई सुझाव भी दिए। उन्होंने मांग की कि मानव–वन्यजीव संघर्ष पर एक स्पष्ट और प्रभावी नीति बनाई जाए, हर प्रभावित गांव में रैपिड रिस्पॉन्स टीम गठित की जाए, गुलदार प्रभावित क्षेत्रों में सोलर लाइट और अलर्ट सिस्टम लगाए जाएं, बंदर और जंगली सूअर पर नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी की जाए, सामूहिक खेत सुरक्षा के लिए सोलर फेंसिंग लगाई जाए तथा ग्राम स्तर पर वन मित्र नियुक्त कर स्थानीय युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाए।

अंत में उन्होंने मुख्यमंत्री से सीधा आग्रह करते हुए कहा कि इस विषय पर तत्काल एक्शन लिया जाए और कागज़ों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर काम दिखाई दे। “हमारे लोग इस तरह मरने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। हम अपने लोगों को यूं मरता हुआ और नहीं देख सकते। अगर अब भी सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो जनता चुप नहीं बैठेगी, जनता एक्शन लेगी,” उन्होंने चेतावनी दी।

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