उत्तराखंड
पढ़ने गया था रूस मिली मौत: रूस-यूक्रेन युद्ध में उत्तराखंड के युवक की मौत
रूस में स्टडी वीजा पर पढ़ाई करने गए और फिर जबरन रूसी सेना में भर्ती किए गए उत्तराखंड के राकेश कुमार की मौत हो गई है। 24 साल का राकेश ऊधम सिंह नगर का रहने वाला था, परिवार को पता लग गया था कि बेटा रूस में फंस गया है लेकिन वो उसे बचाने के लिए भी कुछ नहीं कर सके।
पढ़ाई का सपना लेकर विदेश गया एक होनहार युवक युद्ध की भेंट चढ़ गया। पढ़ने के लिए रूस गए सितारगंज के राकेश मौर्य (30) के हाथों से किताबें छीनकर बंदूक थमा दी गई। संदिग्ध हालात में उसे यूक्रेन से जंग के मैदान में उतार दिया गया जहां कुछ ही दिनों में उसकी मौत हो गई। बुधवार को घर का चिराग निर्जीव देह में घर लाया गया तो हर आंख नम हो गई।
कुशमौठ, शक्तिफार्म निवासी राजबहादुर सिंह के बेटे राकेश मौर्य (30) का सपना बहुत साधारण था। अच्छी पढ़ाई, बेहतर भविष्य और परिवार का सहारा बनना। 5 अगस्त को राकेश स्टडी वीजा पर रूस गया था। उसका मकसद सिर्फ उच्च शिक्षा हासिल करना था लेकिन वहां पहुंचते ही उसकी दुनिया बदल गई। परिजनों का आरोप है कि उसे धोखे से सेना में भर्ती कर लिया गया और हाथों में किताबों की जगह बंदूक थमा दी गई।
30 अगस्त को हुई आखिरी बातचीत में राकेश ने अपने परिवार को इस हकीकत से रूबरू कराया था। उसने बताया कि रूसी सेना ने उसका पासपोर्ट और सभी जरूरी दस्तावेज छीन लिए। मोबाइल और लैपटॉप से आधिकारिक मेल डिलीट कर दिए गए। रूसी भाषा में लिखे दस्तावेजों पर जबरन हस्ताक्षर कराए गए और सैन्य वर्दी पहनाकर उसे डोनबास क्षेत्र में ट्रेनिंग और युद्ध के लिए भेज दिया गया।
भाई की कोशिशें बेकार
राकेश के छोटे भाई दीपू ने बताया कि बड़े भाई की सुरक्षित वापसी के लिए उसने रूस स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क किया था। पूरी घटना की जानकारी दर्ज कराई और मदद की गुहार लगाई। विदेश मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन से भी संपर्क किया गया लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद राकेश को बचाया नहीं जा सका। परिजनों से हुई आखिरी बातचीत के कुछ दिन बाद ही जंग ने राकेश की जिंदगी छीन ली। यूक्रेन में हुए बम-ब्लास्ट में उसकी मौत की खबर जब घर पहुंची, तो पूरा परिवार टूट गया।
बेटे की सलामती के लिए परिजन दिन-रात मांग रहे दुआएं
घर में रोज दीया जलता था, मां की आंखें दरवाजे पर टिकी रहती थीं। भाई और पिता हर फोन कॉल पर उम्मीद बांध लेते थे। रूस में फंसे बेटे की सलामती के लिए परिजन दिन-रात दुआएं मांग रहे थे लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उसका पार्थिव शरीर शक्तिफार्म पहुंचा तो सलामती की दुआ मांगने वाले हाथ छाती पीटते दिखे। मूल रूप से गुर्जर पलिया बदायूं (यूपी) निवासी राकेश का परिवार वर्षों पहले शक्तिफार्म में आकर बस गया था। राकेश ने जीआईसी शक्तिफार्म से प्रारंभिक शिक्षा ली। खटीमा से बीएससी की और आईटी में डिप्लोमा हासिल किया। तीन भाइयों में वह सबसे बड़ा था। एक भाई बेंगलुरु में नौकरी करता है जबकि छोटा भाई बीटेक की पढ़ाई कर रहा है।
