विश्वप्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड का 92वां जन्मदिन: प्रशंसकों ने दी शुभकामनाएं

देहरादून

विश्वप्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड का 92वां जन्मदिन: प्रशंसकों ने दी शुभकामनाएं

92 साल की उम्र में भी लिखने का जुनून देहरादून में मनाया जन्मदिन

प्रसिद्ध लेखक और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित रस्किन बॉन्ड आज यानी की 19 मई को अपना 92वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस बार उनका जन्मदिन बेहद सादगी के साथ देहरादून स्थित आवास पर परिवार के बीच मनाया गया। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से इस बार वह मसूरी नहीं पहुंच सके.
बाल साहित्यकार रस्किन बॉन्ड अपनी रचनाओं के लिए पद्मश्री और पद्मभूषण से नवाजे जा चुके हैं। आज भी वह मसूरी में बेहद साधारण तरीके से जीवन जीना पसंद करते हैं। वह चाहते हैं कि जब तक उनकी सांस चले तब तक वह बच्चों के लिए कहानियां लिखते रहें। तो आइए जानते हैं उनके जन्मदिन के मौके पर लेखक रस्किन बॉन्ड के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…

17 वर्ष की उम्र में लिखी द रूम ऑन-द-रूफ
मूलरूप से रस्किन बांड का परिवार ब्रिटेन का है। उनकी चर्चित रचना द रूम आन द रूफ 17 वर्ष की उम्र में लिखी गई थी, जिसके लिए उन्हें 1957 में कामनवेल्थ राइटिंग के रूप में जान ल्यूवेलिन रीस पुरस्कार मिला था। यह उपन्यास देहरादून व उसके समीप के परिवेश से प्रेरित माना जाता है।

इसके बाद टाइम स्टाप्स एट शमली, आवर ट्रीज स्टिल ग्रो इन देहरा, द ब्लू अम्ब्रेला, ए फ्लाइट आफ पिजन्स और रस्टी शृंखला जैसी रचनाओं ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। रस्किन ने 100 से अधिक कहानी, उपन्यास व कविताएं लिखी हैं। वर्ष 1963 में रस्किन पहाड़ों की रानी मसूरी आ गए।

मिले सम्मान और पहचान
भारतीय साहित्य में योगदान के लिए रस्किन बांड को साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे सम्मान मिल चुके हैं। लेकिन पहाड़ों के इस लेखक की सबसे बड़ी पहचान आज भी उनके पाठकों का प्रेम है।

मसूरी से आत्मीय रिश्ता

रस्किन बॉन्ड पिछले कई दशकों से मसूरी में रह रहे थे और उन्होंने हमेशा कहा कि पहाड़ ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। मसूरी की बारिश, जंगल, बंदर, पहाड़ी बच्चे और यहां की शांत जिंदगी उनकी कहानियों के स्थायी पात्र रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि रस्किन बॉन्ड केवल लेखक नहीं बल्कि मसूरी की सांस्कृतिक पहचान हैं। उनकी वजह से देश-दुनिया के हजारों लोग मसूरी को करीब से जान पाए। साहित्य प्रेमियों का मानना है कि रस्किन बॉन्ड की लेखनी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रकृति, संवेदनशीलता और इंसानी रिश्तों की अहमियत सिखाती रहेगी।

92 साल की उम्र में भी रस्किन बांड सिर्फ एक लेखक नहीं, बल्कि पहाड़ों की याद, बचपन की मासूमियत और शब्दों में बसती संवेदनाओं का नाम हैं। मसूरी की ठंडी हवा में आज भी उनकी कहानियां सांस लेती महसूस होती हैं।