चमोली
इंतजार हुआ खत्म,पर्यटकों के लिए खुली विश्व धरोहर फूलों की घाटी
विश्व धरोहर फूलों की घाटी पर्यटकों के लिए एक जून से खोल दी गई है। घाटी में रंग-बिरंगे फूल रंगत बिखेर रहे हैं। घाटी में करीब दो दर्जन से अधिक प्रजाति के फूल खिल चुके हैं। घाटी का प्रवेश द्वार सुबह आठ बजे खोला जाएगा।
यूनेस्को की विश्व धरोहर की लिस्ट में शामिल ये अद्भुत जगह अपने सुरम्य नजारों, रंग-बिरंगे फूलों और अपनी लंबी ट्रैकिंग के लिए जानी जाती है। दुनियाभर से टूरिस्ट इस फ्लावर्स ऑफ वैली को देखने के लिए 16-17 किमी लंबा ट्रैक चलकर पहुंचते हैं। बारिश का मौसम शुरू होने के साथ ही यहां पर 20 से भी ज्यादा वैराइटी के फूल खिलना शुरू हो जाते हैं। इन फूलों को एक साथ खिला हुआ देखना किसी जन्नत का एहसास देता है। वन विभाग के अधिकारियों ने जानकारी दी है कि इस साल वैली ऑफ फ्लावर नेशनल पार्क में काफी ज्यादा मात्रा में फूल खिले हैं। जो टूरिस्ट को काफी आकर्षित कर रहे हैं।
शुरुआत में घाटी की सैर के दौरान पर्यटकों को लेगी नाले में हिमखंड के साथ 20 से अधिक प्रजाति के रंग-विरंगे फूलों का दीदार होगा। अभी घाटी की सैर के लिए आफलाइन पंजीकरण किए जा रहे हैं। रविवार देर शाम तक 20 से अधिक पर्यटक घाटी के बेस कैंप घांघरिया पहुंच चुके थे।
चमोली जिले में समुद्रतल से 12,995 फीट की ऊंचाई पर 87.5 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली फूलों की घाटी एक जून से 31 अक्टूबर को पर्यटकों के लिए खुली रहती है। यहां जैवविविधता का खजाना बिखरा हुआ है। 500 से अधिक रंग-विरंगे फूलों के साथ यह घाटी दुर्लभ वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास भी है।
यहां आप हिमालयन थार, कस्तूरा मृग, हिम तेंदुआ सहित अन्य वन्य जीवों का दीदार कर सकते हैं। घाटी की विशेषता यह है कि यहां हर 15 दिन में अलग-अलग प्रजाति के फूल खिलते हैं, इससे ऐसा प्रतीत होता है, मानो घाटी रंग बदल रही है।
घाटी आने के लिए बदरीनाथ हाईवे पर ज्योतिर्मठ के पुलना पहुंचना पड़ता है। फिर शुरू होता है घांघरिया तक 10 किमी का पैदल सफर। यहां से घाटी तीन किमी के फासले पर है। रुकने की अनुमति न होने के कारण पर्यटकों को शाम पांच बजे तक हर हाल में घांघरिया लौटना पड़ता है।
कैसे पहुंचे वैली ऑफ फ्लावर्स
वैली ऑफ फ्लावर्स देखने की चाह है तो सबसे पहले जान लें कि यहां तक आप ट्रैकिंग के जरिए ही पहुंच सकते हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन है ऋषिकेश, यहां से आपको गोविंदघाट के लिए कैब या टैक्सी मिल जाएगी। वहीं अगर आप डायरेक्ट सड़क मार्क से आ रहे तो केवल गोविंद घाट तक ही आ सकते हैं। यहां से थोड़ी दूरी पर ही है पुलना गांव। जो आखिरी पड़ाव है।
पुलना से पूरे 10 किमी का रास्ता पैदल ही पूरा करना होता है। इस ट्रैकिंग के बाद आप घांघरिया पहुंचते हैं।
घांघरिया से 3 किमी पैदल और चलकर आप वैली ऑफ फ्लावर्स पहुंचते हैं। फूलों की घाटी नेशनल पार्क में एंट्री के बाद आपको अंदर पूरा पैदल ही चलना होता है। घाटी के अंदर मात्र 5 किमी की ट्रैकिंग की इजाजत है। फूलों की घाटी के बीच में बनी है पुष्पावती नदी, जिसका साफ पानी टूरिस्ट को फूलों से भी ज्यादा अट्रैक्ट करता है। चूंकि फूलों की घाटी में रात रुकना या कैपिंग करना मना है तो हर टूरिस्ट को वापस 3 किमी चलकर घांघरिया लौटना ही पड़ता है।
फूलों की घाटी का परमिट लेना है जरूरी
प्रकृति के इस सुंदर नजारे को देखने के लिए आपको सरकार की परमिट लेना भी जरूरी होता है। वैसे तो ये सुविधा ऑनलाइन भी है। लेकिन साल 2026 में अभी ऑफलाइन परमिट ही दिया जा रहा है। ये परमिट मात्र 1 दिन के लिए ही वैलिड होता है।
ऑफलाइन परमिट की सुविधा घांघरिया में रहती है लेकिन आपको नीचे पुलना और गोविंदघाट में ट्रैक शुरू करने से पहले ही अच्छी तरह से पूछताछ कर लेना चाहिए और परमिट लेकर ही यात्रा करनी चाहिए।
साथ में आधारकार्ड, वोटरआईडी या पैन कार्ड रखना जरूरी होता है।
फूलों की घाटी का परमिट शुल्क आम वयस्क नागरिक के लिए 200 रुपये और बुजुर्ग के लिए 100 रुपये रहता है। 18 साल से ऊपर के स्टूडेंट का 100 रुपये शुल्क रहता है।
फूलों की घाटी की यात्रा के पीछे का इतिहास
इस पर्वतारोहण यात्रा का इतिहास सन् 1931 में फ्रैंक एस. स्माइथ और उनके साथी पर्वतारोही एरिक शिपटन की आकस्मिक खोज से शुरू हुआ। माउंट कामेट पर चढ़ाई के बाद वे मानसून के घने कोहरे में रास्ता भटक गए और अनजाने में इस छिपे हुए स्वर्ग में पहुँच गए। इस अनुभव से मोहित होकर, स्माइथ 1937 में वापस घाटी में कई हफ्तों तक रहे और वहाँ के पौधों का अध्ययन किया। बाद में उन्होंने ‘द वैली ऑफ फ्लावर्स’ नामक एक बेहद लोकप्रिय पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक ने दुनिया भर के साहसी लोगों को हिमालय के इस दूरस्थ मार्ग से परिचित कराया।
1939 में, जोन मार्गरेट लेग्गे नामक एक ब्रिटिश वनस्पति विज्ञानी फूलों का अध्ययन करने के लिए वहां गईं, लेकिन एक खड़ी चट्टानी ढलान पर फिसलने से उनकी दुखद मृत्यु हो गई; उनकी स्मृति में बना स्मारक आज भी ट्रेकिंग मार्ग पर मौजूद है। इसके समृद्ध इतिहास और जैव विविधता की रक्षा के लिए, भारत सरकार ने इसे 1982 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया, और बाद में 2005 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता मिली।
