लोकतंत्र में संवाद बनाम टकराव: सत्ता का दायित्व और विपक्ष की भूमिका — राकेश राणा

टिहरी

लोकतंत्र में संवाद बनाम टकराव: सत्ता का दायित्व और विपक्ष की भूमिका — राकेश राणा

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यहां प्रत्येक नागरिक, छात्र, सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल को अपनी बात शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से रखने का अधिकार प्राप्त है। जब किसी राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर देशभर में व्यापक असंतोष पैदा होता है, तब सरकार का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना ही नहीं, बल्कि जनता की चिंताओं को गंभीरता से सुनना और उनका समाधान करना भी होता है।

नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक के आरोपों के बाद देशभर में लाखों छात्र-छात्राओं और अभिभावकों में गहरी चिंता और आक्रोश देखने को मिला। परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग को लेकर देशभर में आवाज उठी। ऐसे समय में विपक्ष द्वारा संसद के भीतर और बाहर सरकार से जवाब मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक और संवैधानिक हिस्सा है।

लोकसभा और राज्यसभा केवल बहस के मंच नहीं हैं, बल्कि वे देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं। जब किसी मुद्दे को संसद में प्रमुखता से उठाया जाता है, तो सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह उस विषय पर स्पष्ट, गंभीर और संतोषजनक उत्तर दे। लोकतंत्र में जवाबदेही ही सुशासन की पहचान होती है।

इसी क्रम में लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी ने संसद के भीतर लगातार छात्रों की आवाज बुलंद की और बाद में प्रधानमंत्री आवास की ओर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर छात्रों की मांगों के समर्थन में अपनी बात रखी। लोकतंत्र में विपक्ष का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह जनता के मुद्दों को सरकार तक पहुंचाए। यदि किसी शांतिपूर्ण विरोध के दौरान पुलिस द्वारा अनावश्यक बल प्रयोग, दुर्व्यवहार अथवा अभद्र व्यवहार किया जाता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का उत्तर संवाद से दिया जाना चाहिए, न कि दमन से। सरकार को चाहिए कि वह विपक्ष और छात्रों द्वारा उठाई गई मांगों को गंभीरता से सुने तथा लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान करते हुए सार्थक संवाद स्थापित करे।

इसके साथ ही देश के विभिन्न राज्यों में जिस प्रकार भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा कांग्रेस कार्यालयों के घेराव और टकराव की घटनाएं सामने आई हैं, वे लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए चिंताजनक हैं। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष होना चाहिए, व्यक्तियों का नहीं। राजनीतिक मतभेद यदि सड़क पर हिंसक टकराव में बदलने लगें, तो इससे लोकतंत्र की गरिमा और सामाजिक सौहार्द दोनों को नुकसान पहुंचता है।

यदि देश में बार-बार विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो स्वाभाविक है कि जनता जवाबदेही तय करने की मांग करेगी। विपक्ष द्वारा संबंधित मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने अथवा इस्तीफे की मांग करना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। सरकार का दायित्व है कि वह निष्पक्ष जांच कराए, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करे।

राजनीति का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को शत्रु मानना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए। यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत वैमनस्य और टकराव में बदल जाएगी, तो उसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और देश के युवाओं के विश्वास को होगा।

लोकतंत्र में सत्ता की जिम्मेदारी विपक्ष से अधिक होती है, क्योंकि शासन चलाने का दायित्व उसी के पास होता है। इसलिए सरकार को आलोचना को लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा मानते हुए उसे सुनना चाहिए, उसका उत्तर देना चाहिए और जनता के बीच विश्वास बनाए रखना चाहिए। वहीं विपक्ष को भी अपने संघर्ष को संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप आगे बढ़ाना चाहिए।

आज आवश्यकता किसी दल की जीत या हार की नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने की है। जब तक परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय नहीं बनेगी तथा जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक युवाओं का विश्वास पूरी तरह बहाल नहीं हो सकेगा। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब सत्ता और विपक्ष दोनों संविधान की भावना का सम्मान करते हुए जनता के हित को सर्वोपरि रखेंगे।